
मैं ये चीज अवलोकन के दौरान पकड़ता हूं कि जब कोई कुछ बोलता है तो उसका उत्तर मैं देता हूं। लेकिन कुछ क्षणों में मुझे एहसास होता है कि ये उत्तर मैने होश और समझ से नहीं दिया बल्कि पहले के अनुभवों से ही ये अपने आप निकल आया।
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मैं ये चीज अवलोकन के दौरान पकड़ता हूं कि जब कोई कुछ बोलता है तो उसका उत्तर मैं देता हूं। लेकिन कुछ क्षणों में मुझे एहसास होता है कि ये उत्तर मैने होश और समझ से नहीं दिया बल्कि पहले के अनुभवों से ही ये अपने आप निकल आया।

अभिषेक जी, आपने लिखा कि उत्तर "अपने आप निकल आया", और यह पकड़ भी आपको तब आई जब उत्तर जा चुका था। यानी जवाब पहले से तैयार बैठा था, कोई सुन भी रहा था या नहीं, इससे उसे फ़र्क ही नहीं पड़ा। जो चीज़ बिना सुने निकल आती है, उसे आप अपना उत्तर कहते हैं, जबकि वह पुराने अनुभवों का चलाया हुआ पुर्ज़ा है। असली सवाल यह है कि उस एक पल में, जब जवाब मुँह तक आ चुका था, उसे रोककर सुनने की जगह किसने बनाई, और रोज़ की बातचीत में आप उसे कितनी बार बनाने की नीयत रखते हैं। अवलोकन के इन पलों को आचार्य जी के सत्रों के साथ लगातार जोड़ते रहिए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401