
Talking Mirror
अभिषेक जी, आपने लिखा कि उत्तर "अपने आप निकल आया", और यह पकड़ भी आपको तब आई जब उत्तर जा चुका था। यानी जवाब पहले से तैयार बैठा था, कोई सुन भी रहा था या नहीं, इससे उसे फ़र्क ही नहीं पड़ा। जो चीज़ बिना सुने निकल आती है, उसे आप अपना उत्तर कहते हैं, जबकि वह पुराने अनुभवों का चलाया हुआ पुर्ज़ा है। असली सवाल यह है कि उस एक पल में, जब जवाब मुँह तक आ चुका था, उसे रोककर सुनने की जगह किसने बनाई, और रोज़ की बातचीत में आप उसे कितनी बार बनाने की नीयत रखते हैं।…















