
हम उसे देखना इसलिए नहीं चाहते, क्योंकि इससे हमारे अंदर की सच्चाई और कमियाँ सामने आयेंगी। जिसे शायद हम स्वीकार नहीं कर पाते। और इसीलिए हम स्वयं को कभी समझ ही नहीं पाते कि हमें किस प्रकार जीवन को जीना है।





























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हम उसे देखना इसलिए नहीं चाहते, क्योंकि इससे हमारे अंदर की सच्चाई और कमियाँ सामने आयेंगी। जिसे शायद हम स्वीकार नहीं कर पाते। और इसीलिए हम स्वयं को कभी समझ ही नहीं पाते कि हमें किस प्रकार जीवन को जीना है।

परमेश्वरी जी, आपने ठीक पकड़ा कि न देखना एक बचाव है। पर ज़रा और गहरे झांकिए, इसमें एक पेंच और है। आप कह रही हैं कि सच्चाई देखने से बचते हैं, ताकि पता न चले जीवन कैसे जीना है। मगर सालिएरी को अपनी कमी पता ही थी, वह तो मोज़ार्ट से कम प्रतिभाशाली होना जानता था। उसकी असली चोट कमी की नहीं थी, उस हिसाब की थी जो उसने ईश्वर से लगा रखा था कि त्याग के बदले हक़ मिलना चाहिए। तो सवाल यह नहीं कि हम अपनी कमी क्यों नहीं देखते, सवाल यह है कि हम वह हिसाब क्यों नहीं देखते जो हमने अपने त्याग, अपनी मेहनत, अपनी अच्छाई के पीछे चुपके से बना रखा है। कमी स्वीकारना तो कई बार आसान होता है, अपने भीतर का दुकानदार पकड़ना कठिन होता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401