
मैं तो रोने तक लगती हूं, कभी कभी ऐसा लगता है कि क्यों कर रही हूं ये सब इससे अच्छा तो बिना जाने ही खुशी से जीती थी। मैं एक छोटी ग्रामीण परिवार से हूं, मेरे गांव में शायद मैं ही ऐसी हूं जो आचार्य जी को सुनती हूं, मैने कुछ महीने पहले अपने फ्रेंड्स को बुक दिया " विद्यार्थी जीवन पढ़ाई और मौज" , एक बोली की कौन नहीं लिख देगा ऐसी किताबें, मैं भी तो सब जानती हूं, ये वो ऐसे ही बकी वो। और दूसरी तो बड़ी उत्सुकता से ली " समय" क्यूंकि उसका बर्थडे था तो मैने…


















