
जिस व्यवस्था से हम लड़ रहे होते है उसके बीज हमारे अंदर भी होते हैं। उस मैं को देख भी रहे होते है तो भी चुप रहते है। साथ भी है और खिलाफ भी है और चलेंगे भीड़ में ही। AP में जुड़ने से पहले लगता था तुम कितने भी सच्चे क्यों न हो, झुकना भीड़ के सामने ही है, सच सुनने वाला कोई नहीं है। कई जगह जानती हुई भी कि ये ग़लत है फिर भी उनका साथ दिया। साथ खड़े होने में खुद के अंदर गुस्से को पाला है
















