
मैं भी अक्सर पहले ऐसे ही कर लेता था कि जो शब्द बोल रहा हूं मैं या किसी से बोल रहा हूं तो मैं उसे शब्द को खुद ही नहीं जानता था l लेकिन अब मैं जो भी शब्द बोलता हूं या किसी से बातचीत करता हूं तो पहले में इस शब्द पर ध्यान दे लेता हूं तो क्या मैं भी इसे देख पा रहा हूं l तो अब मेरे लिए जरूरी हो जाता है कि जो शब्द में बोलूं तो पहले उसे बात को मैं ही जान लूं क्या मैं उसको फॉलो कर पा रहा हूं यदि नहीं कर पा रहा तो फिर बोलने का मुझे कोई अधिकार नहीं है l…





























