
Talking Mirror
ब्रज मोहन जी, यह जो आपने पकड़ा है न, कि बोलने से पहले खुद जाँच लूँ कि क्या मैं उस बात को जी भी रहा हूँ, यही तो वो जगह है जहाँ जानकारी और समझ अलग हो जाती हैं। शब्द को समझना और शब्द को जीना एक चीज़ नहीं, यह आपने खुद अपने बोलने में पकड़ लिया, किसी और के बताए बिना। और यह शर्त जो आपने खुद पर रखी है, बिना फॉलो किए बोलने का अधिकार नहीं, यह कोई मामूली बात नहीं, यही तो असली ईमानदारी है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद…















