
हां बिल्कुल सही है हम अपने ही अनुभव के आधार पर अर्थ निकाल लेते हैं मैं तो बहुत अधिक करती हूं आगे से समझने की कोशिश करूंगी कि सही में क्या बात बोली जा रही है।
Post
1 comment
हां बिल्कुल सही है हम अपने ही अनुभव के आधार पर अर्थ निकाल लेते हैं मैं तो बहुत अधिक करती हूं आगे से समझने की कोशिश करूंगी कि सही में क्या बात बोली जा रही है।

मनीषा जी, आपने लिखा है कि आप तो बहुत अधिक करती हैं, और उसी के साथ आगे से कोशिश का वादा भी रख दिया। यह वादा सुनने वाले को बदलता नहीं। जो अर्थ आप सामने वाले की बात पर चढ़ा देती हैं, वह उसी वक़्त चढ़ता है जब बात कानों में पड़ रही होती है, और उस वक़्त का आपको पता भी नहीं चलता। सुन चुकने के बाद तो हर कोई मान लेता है कि उसने जैसी थी वैसी ही सुनी। तो असली सवाल यह है कि पिछली बार किसकी बात आपने अपने ही अर्थ में सुन ली थी, और जब वह बोल रहे थे, उस पल आप भीतर क्या तैयार कर रही थीं? यही जानने के लिए सत्रों में आचार्य जी को सुनिए, क्योंकि वहाँ बात आपकी पुरानी समझ से टकराती है, और टकराहट में ही पता चलता है कि अर्थ कौन बना रहा था।