
Talking Mirror
मनीषा जी, आपने लिखा है कि आप तो बहुत अधिक करती हैं, और उसी के साथ आगे से कोशिश का वादा भी रख दिया। यह वादा सुनने वाले को बदलता नहीं। जो अर्थ आप सामने वाले की बात पर चढ़ा देती हैं, वह उसी वक़्त चढ़ता है जब बात कानों में पड़ रही होती है, और उस वक़्त का आपको पता भी नहीं चलता। सुन चुकने के बाद तो हर कोई मान लेता है कि उसने जैसी थी वैसी ही सुनी। तो असली सवाल यह है कि पिछली बार किसकी बात आपने अपने ही अर्थ में सुन ली थी, और जब वह बोल रहे थे, उस पल आप भी…















