
मैं तो अपनी ही बात कर सकता हु, मै तो बहोत बार अगर अन्याय भी हो रहा है तो उसे नजर अंदाज कर लेता हु. उपरवाले जैसा बोलते है वैसा ही मानलेता हु. अपनी बात स्पष्ट रूप से बोलने मे भी डर लगता है. फांसी तो छोड़ो boss के सामने भी अपनी बात रखने मे डर लगता है. कभी एकदम उतावला हो जाता हु, तो कभी एकदम ही धीमा, boss के केबिन मे जाने के बाद दिमाग़ काम करना बंद कर देता है. जो बोलना होता है वों बोल नहीं पाता. ऐसा बहोत बार हुआ है. शायद इसीलिए शोषण भी होता है और मैं…





























