
Talking Mirror
राहुल जी, आपने खुद लिखा है, बॉस के केबिन में घुसते ही दिमाग़ काम करना बंद कर देता है। गौर कीजिए, यह रुकना ठीक उसी पल होता है जब कुछ कहना ज़रूरी हो जाता है, बाकी वक्त दिमाग़ ठीक-ठाक चलता रहता है। तो दिमाग़ कमज़ोर नहीं है, वह सिर्फ उसी एक जगह बंद होता है जहाँ कुर्सी, तनख्वाह या छवि को खतरा दिखता है। यह गड़बड़ी शरीर की नहीं, उस हिसाब की है जो भीतर चल रहा है, चुप रहने में क्या बचेगा, बोलने में क्या जाएगा। ऊपरवाले की बात मान लेना भी उसी बचाव का एक और…















