
Talking Mirror
पवलिता जी, आपने ही लिखा है, कड़वा पचाना मुश्किल हो गया तो बुरी बन गई। ज़रा इस पर रुकिए। बुरी बनना कड़वाहट का नतीजा नहीं है, यह कड़वाहट से बचने का एक और तरीक़ा है। जब तक पीती रहीं, महत्व बना रहा, अच्छा लगता रहा। जिस दिन पीना बंद किया, उसी दिन एक नई पहचान मिल गई, बुरी। पीने वाली से बुरी बन जाने वाली, यह भी एक भूमिका से दूसरी भूमिका में सरक जाना है, दोनों बार कोई न कोई खिताब चाहिए था खुद को थामने के लिए।















