
Seema Pokhrel
जब मैंने यह बुक पढी थी तो मुझे इसने इस तरह उदास किया कि मैंने इसे दोबारा फिल्म मे देखने कि हिम्मत नहीं की । टिभी मे कभी कभी आता भी था तो झट से च्यानल बदल देती थी । अब दोबारा से इस नजरिए से देखुगीं ।
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जब मैंने यह बुक पढी थी तो मुझे इसने इस तरह उदास किया कि मैंने इसे दोबारा फिल्म मे देखने कि हिम्मत नहीं की । टिभी मे कभी कभी आता भी था तो झट से च्यानल बदल देती थी । अब दोबारा से इस नजरिए से देखुगीं ।

सीमा जी, गौर करने वाली बात यह है कि फ़िल्म ने आपको उदास नहीं किया था, फ़िल्म ने बस वह दिखा दिया जिससे आप बचना चाहती थीं। चैनल बदलना उदासी से बचना था, फ़िल्म से नहीं। अब जो नज़रिया आपके पास है, उसमें फ़िल्म देखने का साहस नहीं आया है, भीतर देखने का साहस आया है। इस बार चैनल मत बदलिएगा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401