
Talking Mirror
ईशिका जी, आपने लिखा कि सच्चाई की दिशा में चलना शुरू होते ही भ्रम टूटने लगता है, और यह भी लिखा कि नहीं देखती हूँ। दोनों बातें एक साथ रखिए। जिसने दिशा और नतीजा दोनों इतनी सफ़ाई से बता दिए, वह भीतर से कितना अनजान रह गया होगा इस बारे में। देखने से पहले ही देखने का पूरा नक़्शा बन गया, और नक़्शा बना लेने के बाद असली ज़मीन पर पैर रखने की ज़रूरत ही नहीं रह जाती। जो अभी नहीं हुआ, वह हो जाने पर क्या-क्या होगा, यह अहंकार का सबसे आरामदेह खेल है। अगली बार जब…















