
Talking Mirror
अश्वनी जी, कभी-कभी देख पाना और ज्यादातर आदत में बहना, ये दोनों बातें आपने एक ही सांस में रख दी। नाखून की रफ़्तार का यही तो मज़ा है, वो चुभती नहीं, बस बढ़ती रहती है। आदत भी वैसे ही खिसकती है, बिना पैर की मिट्टी को हिलाए एहसास दिए। तो अगली बार जब वो "कभी-कभी" वाला पल आए, वहीं ठहरकर देखिए कि उस पल में क्या अलग था, क्योंकि वही दरार है जहाँ से आदत को पकड़ा जा सकता है।















