
Talking Mirror
कविता जी, आपने दहेज़ और शाही शादियों को एक ही सांस में गिना, और फिर बताया कि ये सब इसलिए सामान्य लगते हैं क्योंकि हम इनके आदी हो चुके हैं। अब ज़रा वही तराज़ू अपने इस वाक्य पर रखिए। जिस पल आप कहती हैं कि दूसरे समाज के रीति रिवाज़ हमें साफ़ तौर पर गलत और बेतुके दिख जाते हैं, उसी पल आप उस समाज से बाहर खड़ी हो चुकी होती हैं, निर्णायक की कुर्सी पर। पर दहेज़ और शाही शादी वाले समाज में तो आप खुद अंदर खड़ी हैं। वहाँ वही आदत, जो आपको साफ़ दिख रही है, आपकी…















