
Ishika sharma
उसकी कीमत सब चुका रहे हैं। पर गलती हमलोग कर रहे है। हम अपने आप में इतना खोए हुए है सामने दिख के भी नहीं दिख रहा है कि क्या हो रहा है और किसके वजह से हो रहा है। जब तक खुद के भीतर नहीं देखेगी मेरी नियत कैसी है तब तक सभी को भुगतना पड़ेगा।
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उसकी कीमत सब चुका रहे हैं। पर गलती हमलोग कर रहे है। हम अपने आप में इतना खोए हुए है सामने दिख के भी नहीं दिख रहा है कि क्या हो रहा है और किसके वजह से हो रहा है। जब तक खुद के भीतर नहीं देखेगी मेरी नियत कैसी है तब तक सभी को भुगतना पड़ेगा।

ईशिका जी, आपने लिखा कि जब तक अपनी नियत नहीं देखेंगे तब तक सब भुगतेंगे, और फिर वाक्य को मोड़ लिया, मेरी नियत। यह जो अचानक सामने से भीतर की ओर मुड़ना हुआ, यही वह जगह है जहाँ बाकी सब रुक जाते हैं, आप नहीं रुकीं। पहाड़ कटता है, ज़मीन खिसकती है, इसका हिसाब अखबार में छपता है। पर वह हिसाब कभी यह नहीं बताता कि आज सुबह मुझे कितना चाहिए था और मैंने कितना ले लिया। वह सवाल केवल आप खुद से पूछ सकती हैं, कोई रिपोर्ट नहीं पूछेगी।