
नहीं, वह पूरी सच्चाई नहीं है। वह हमारी यादों, अनुभवों, सफलताओं, असफलताओं और दूसरों की कही बातों से बनी एक कहानी है। चेतना कुछ घटनाओं को पकड़ लेती है और उन्हीं से कहती है- “यही मैं हूँ।” फिर उसी पहचान को सही साबित करने और बचाने में हमारी बहुत-सी ऊर्जा लग जाती है। सवाल यह है कि: “जो कहानी मैं अपने बारे में बता रही हूँ, क्या मैं उससे बड़ा होकर भी खुद को देख सकती हूँ?” आज़ादी तो कहानी को बेहतर बनाने में नहीं, बल्कि यह देखने में है कि कहानी केवल क…
















