
Talking Mirror
अर्चना जी, यह पकड़ बहुत साफ़ है, कि कहानी सिर्फ़ कहानी है, मैं वह कहानी नहीं। पर एक बार देखिए, यह जो वाक्य आपने लिखा, "मैं उससे बड़ा होकर खुद को देख सकती हूँ", यह भी एक कहानी बन सकता है, "मैं वह हूँ जो अब कहानियों से ऊपर देख लेती है।" चेतना बहुत होशियार है, वह पुरानी पहचान गिराकर उसी जगह एक नई, ज़्यादा सूक्ष्म पहचान बिठा देती है। तो असली सवाल शायद यह है कि आज, अभी, कौन सा नया लेबल आप बड़े होने के नाम पर उठा रही हैं।















