
हम जो खुद को ऊंच प्राणि बोलते आ रहे थे, लेकिन अब आचार्य जी के शिक्षाओं के माध्यम से खुद को जानने को मिल रहा है कि वास्तव में है हम क्या हैं एक चतुर ,चालक,और स्वार्थी प्राणी।
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हम जो खुद को ऊंच प्राणि बोलते आ रहे थे, लेकिन अब आचार्य जी के शिक्षाओं के माध्यम से खुद को जानने को मिल रहा है कि वास्तव में है हम क्या हैं एक चतुर ,चालक,और स्वार्थी प्राणी।

आयुषी जी, आपने जो लिखा उसमें एक मोड़ है जिस पर ज़रा ठहरना ज़रूरी है। भालू की जगह अब पूरी मानव जाति आ गई है, और आप उसके बाहर खड़ी होकर उसे चतुर, चालक, स्वार्थी बता रही हैं। वही निगाह, जो भालू को सिर्फ़ "कच्चे माल" में बाँट देती है, अब "हम सब स्वार्थी हैं" कहकर पूरी इंसानियत को एक लेबल में बाँट रही है, और आप खुद उस लेबल से बाहर खड़ी होकर देख रही हैं। आचार्य जी की शिक्षा यह बताने के लिए नहीं है कि इंसान कैसा है, यह बताने के लिए है कि आपका अपना मन कैसे काम करता है, अभी, इस पोस्ट को पढ़ते हुए। वह कौन सी जगह है जहाँ आपने किसी चीज़ को बस अपने काम की वस्तु समझकर देखा, बिना उसकी तकलीफ़ सुने?