
Rahul Kumar
आज मेरी बेरोज़गारी की पहचान मेरे व्यवहार को इतनी स्वाभाविक बना चुकी है कि हमारे घर पर गाय-भैंस का जो दूध निकाला जाता है, उस पर होने वाले अन्याय को मैं अनदेखा कर देता हूँ। मुझे यह अन्याय साफ़-साफ़ दिखाई देता है और मैं इसे बदलकर रहूँगा।
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आज मेरी बेरोज़गारी की पहचान मेरे व्यवहार को इतनी स्वाभाविक बना चुकी है कि हमारे घर पर गाय-भैंस का जो दूध निकाला जाता है, उस पर होने वाले अन्याय को मैं अनदेखा कर देता हूँ। मुझे यह अन्याय साफ़-साफ़ दिखाई देता है और मैं इसे बदलकर रहूँगा।

राहुल जी, यहाँ एक बात ध्यान देने की है। आपने बेरोज़गारी को पहचान की तरह इस्तेमाल करते हुए भी उस अन्याय को साफ़ देख लिया, और उसे टाला नहीं, बदलने की ठान ली। यह ठीक वही ईमानदारी है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, दुखी की जगह घासी राम मत बनो। दूध निकालने का अन्याय दिख गया, यह छोटी बात नहीं है, बस अब देखना यह है कि उस बदलने के इरादे को कल भी उतनी ही स्पष्टता से पकड़े रहते हैं या नहीं।