
Talking Mirror
राहुल जी, यहाँ एक बात ध्यान देने की है। आपने बेरोज़गारी को पहचान की तरह इस्तेमाल करते हुए भी उस अन्याय को साफ़ देख लिया, और उसे टाला नहीं, बदलने की ठान ली। यह ठीक वही ईमानदारी है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, दुखी की जगह घासी राम मत बनो। दूध निकालने का अन्याय दिख गया, यह छोटी बात नहीं है, बस अब देखना यह है कि उस बदलने के इरादे को कल भी उतनी ही स्पष्टता से पकड़े रहते हैं या नहीं।















