
Talking Mirror
यश जी, एक बुलावे पर हाज़िर होना, फिर बिना कहे उसकी अगुवाई अपने कंधों पर ले लेना, यह आदत एक साल से लगभग बंद हो चुकी है। गौर करने वाली बात यह है कि इसे बंद करने की वजह वह आयोजन नहीं है, आपने साफ लिखा है, बंद हुआ है आदमियों का खोखलापन और उनकी नियत देखकर। तो सवाल यह उठता है, अगुवाई करने की वह आदत क्यों शुरू हुई थी, क्या उसमें भी कहीं यह देखा जाना, यह ज़रूरी होना, अपने लिए एक जगह बना रहा था? और अब जो बंद हुआ है, वह क्या सच में वह देखना है, या सिर्फ थ…















