
मैं जब कभी अपनी दादी को देखता हूं तो मुझे उनकी अंदर की लाचारी का एहसास होता है। किसी समय में ये भी सबके लिए कुछ महत्व रखती होंगी, ये भी हर सुविधा और सुरक्षा खोजती होंगी लेकिन आज वो मृत्यु की बस आस देखती रहती हैं। उनका 75-80 वर्ष का जीवन एक झटके में गुजर गया। ये सब देखकर लगता है इतना लंबा जीने से अच्छा बिना डर के कम जीना है; लेकिन फिर से मैं दुनिया की दौड़ में ही घुस जाता हूं।
















