
Talking Mirror
अभिषेक जी, दादी की लाचारी देखकर आपने जो गणित लगाया, वही टेगरा की उम्र में था, सिर्फ नतीजा उल्टा निकाला। आपने तय कर लिया कि लंबा जीना घाटे का सौदा है, और डर रहा फिर भी वहीं, सिर्फ जीने के डर से मरने के हिसाब में बदल गया। गिनती वही चल रही है, बस अंक बदल दिए। टेगरा को लंबा जीवन बनाम छोटा जीवन नहीं दिख रहा था, उसे सिर्फ वह एक क्षण दिख रहा था और उसमें कोई हिसाब नहीं था। आपका वाक्य खत्म होते ही आप फिर दौड़ में घुस गए, यह ईमानदारी की बात है, झिड़कने की…
















