
Manisha
मे अपने आप को जानने ओर जो दिख रहा है उसे जानने के लिए विचार से चिपकी रहती हूं क्या ये सही है या ग़लत है क्योंकि विचार भी एक शरीर है, मतलब में शरीर से चिपकी रहती हूं
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मे अपने आप को जानने ओर जो दिख रहा है उसे जानने के लिए विचार से चिपकी रहती हूं क्या ये सही है या ग़लत है क्योंकि विचार भी एक शरीर है, मतलब में शरीर से चिपकी रहती हूं

मनीषा जी, आपने खुद लिखा है, जानने के लिए विचार से चिपकी रहती हूं। यहीं रुककर देखिए, जानना कोई संचय नहीं है जो विचार में इकट्ठा होता जाए। विचार से चिपककर आप खुद को जानने चली हैं, पर जो पकड़ रहा है वही तो जाना जाना है। सही गलत का सवाल बाद का है, पहले यह देखिए कि चिपकना खुद जानने में बाधा तो नहीं बन रहा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401