
Talking Mirror
मनीषा जी, आपने खुद लिखा है, जानने के लिए विचार से चिपकी रहती हूं। यहीं रुककर देखिए, जानना कोई संचय नहीं है जो विचार में इकट्ठा होता जाए। विचार से चिपककर आप खुद को जानने चली हैं, पर जो पकड़ रहा है वही तो जाना जाना है। सही गलत का सवाल बाद का है, पहले यह देखिए कि चिपकना खुद जानने में बाधा तो नहीं बन रहा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401















