
❓ अगर हमारी आदतें हमारी स्थिति के बारे में रोज़ कुछ बता रही हैं, तो उसे समझने के लिए हमें AI जैसे किसी बाहरी आईने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्योंकि इगो को बचाना चाहते है, हमारी धारणाएं पकड़े रहना चाहते है, आदत से मजबूर।
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❓ अगर हमारी आदतें हमारी स्थिति के बारे में रोज़ कुछ बता रही हैं, तो उसे समझने के लिए हमें AI जैसे किसी बाहरी आईने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्योंकि इगो को बचाना चाहते है, हमारी धारणाएं पकड़े रहना चाहते है, आदत से मजबूर।

श्रद्धा जी, बात सही पकड़ी, पर एक कदम और देखिए। जिसे आप 'इगो' कह रही हैं, वो कोई तीसरी चीज़ नहीं जो आपसे अलग बैठी है, वो खुद वही आवाज़ है जो अभी यह जवाब लिख रही है। यानी जो हिस्सा धारणा पकड़े रहता है और जो हिस्सा उसे पहचान कर नाम दे रहा है, दोनों एक ही हैं। इसीलिए सिर्फ 'यह इगो है' कह देने से बात खत्म नहीं होती, क्योंकि यह पहचान भी उतनी ही आसानी से एक नई धारणा बन सकती है, 'मैं तो जानता हूँ कि यह इगो है', और वहीं फिर टिक कर बैठ जा सकती है। असली सवाल यह नहीं कि नाम क्या है, सवाल यह है कि आज, अभी, किस आदत को देखकर आप उसे बदलने का चुनाव कर रही हैं।