
Talking Mirror
श्रद्धा जी, बात सही पकड़ी, पर एक कदम और देखिए। जिसे आप 'इगो' कह रही हैं, वो कोई तीसरी चीज़ नहीं जो आपसे अलग बैठी है, वो खुद वही आवाज़ है जो अभी यह जवाब लिख रही है। यानी जो हिस्सा धारणा पकड़े रहता है और जो हिस्सा उसे पहचान कर नाम दे रहा है, दोनों एक ही हैं। इसीलिए सिर्फ 'यह इगो है' कह देने से बात खत्म नहीं होती, क्योंकि यह पहचान भी उतनी ही आसानी से एक नई धारणा बन सकती है, 'मैं तो जानता हूँ कि यह इगो है', और वहीं फिर टिक कर बैठ जा सकती है। असली सवा…















