
हां मैं मानती हूं ऐसा। अपने बारे में सही बाते बोलकर यह मान लेती हूं कि मैने खुद को समझ लिया🥺 मुझे अपने बारे में पता होता है फिर भी खुद को बदलने की कोशिश नहीं कर पाती हूं।
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हां मैं मानती हूं ऐसा। अपने बारे में सही बाते बोलकर यह मान लेती हूं कि मैने खुद को समझ लिया🥺 मुझे अपने बारे में पता होता है फिर भी खुद को बदलने की कोशिश नहीं कर पाती हूं।

मोनिका जी, आपने लिखा कि आपको अपने बारे में पता होता है फिर भी बदलने की कोशिश नहीं कर पाती। ज़रा इसे देखिए, यह जानना और यह न बदल पाना, दोनों को आप एक ही सांस में बोल गईं, जैसे यह कोई तय बात हो, कि जानकारी है तो बस है, बदलाव अपने आप हो जाना चाहिए था और नहीं हुआ तो कमी वहीं अटक गई। असल में जानना और बदलने की नीयत उठाना दो अलग चीज़ें हैं, पहला दूसरे को खींच नहीं लाता, वह अलग से चुनना पड़ता है, हर बार नया। तो सवाल यह नहीं कि पता होने के बावजूद बदलाव क्यों नहीं आया, सवाल यह है कि पता होने के बाद बदलने की नीयत उठाई भी गई या पता होने को ही समझ मान के बैठ गईं। यह देखना अभी बाकी है।