
आपका यह अवलोकन से मुझे भी याद आई कि मैं AP framework में पढ़ रही थी कि अहंकार के विघटन के चरण में : एक बहुत क्षीण हो चुका अहंकार भी तेजी से अपनी सघन अवस्था में बापस लौट सकता है। अहंकार शरीर के जीवित रहने तक यह संभावना कभी शून्य नहीं होती। और दुसरी बात मैं भी कुछ दिनों से अवलोकन कर रही हूं, वही बात आप ने भी लिखा है और आचार्य जी कहते है काम ही जीवन है। और मैं अपनी और दूसरे के जीवन में दिख पा रही है कि पूरी ईमानदारी से जीवन न जीना कैसे हावी हो रहा ह…
















