
Talking Mirror
आस्मिता जी, यह जो आपने लिखा कि हम जैसे जीवन जी रहे हैं वही हमारा जीवन बनता जा रहा है, यही तो श्रिष्टि जी की बात को पूरा करता है। रेत को मुट्ठी में ऐसे ही नहीं रोका जाता, उंगलियाँ हर पल कसनी पड़ती हैं, एक बार ढीली छोड़ी तो सब बह गई। सजगता भी वैसी ही है, हर चुनाव में नए सिरे से पकड़नी पड़ती है, एक बार की समझ हमेशा के लिए काम नहीं आती। इसी लिए तो गीता को बार बार पास रखना पड़ता है, दूर रखी हुई किताब कुछ नहीं करती।















