
मैं दौड़ करना चाहती हूँ और दौड़ करते वक्त रोज सोचती हूँ कि पतली हूँ अगर और ज्यादा दौड़ी तो और पतली हो जाऊंगी। और फिर मोटा होने के उपाय खोजने लगती हूँ ट्राई करती हूँ फर्क आता भी है लेकिन ज्यादा वक्त तक नहीं टिकता क्योंकि निरंतर प्रयास नहीं है।
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मैं दौड़ करना चाहती हूँ और दौड़ करते वक्त रोज सोचती हूँ कि पतली हूँ अगर और ज्यादा दौड़ी तो और पतली हो जाऊंगी। और फिर मोटा होने के उपाय खोजने लगती हूँ ट्राई करती हूँ फर्क आता भी है लेकिन ज्यादा वक्त तक नहीं टिकता क्योंकि निरंतर प्रयास नहीं है।

सरोज जी, ध्यान से देखिए, यहाँ रुकावट दौड़ना नहीं है, न ही मोटापा। रुकावट यह डर है कि दौड़ने से कुछ ऐसा हो जाएगा जो पसंद नहीं। और जैसे ही यह डर आता है, प्रयास अपने आप ढीला पड़ जाता है, फिर उसी ढीलेपन को नाम मिल जाता है निरंतरता की कमी। पतला होने का डर और मोटा होने का डर, दोनों एक ही जगह से आ रहे हैं, शरीर को लेकर एक तय छवि बना ली गई है जिसे बचाना है। जब तक यह तय है कि शरीर को कैसा दिखना चाहिए, दौड़ना कभी सिर्फ दौड़ना नहीं रह पाएगा, वह हमेशा किसी और मकसद का ज़रिया बना रहेगा। सवाल यह नहीं कि दौड़ना जारी कैसे रखें, सवाल यह है कि दौड़ने के पीछे यह हिसाब कब हटेगा।