
Shivam
यही है कि ये झूठ के जो रिश्ते है जहाँ कुछ नही मिल रहा उनसे चिपका हूँ, बाहर जिंदगी की कल्पना ही नही कर रहा
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यही है कि ये झूठ के जो रिश्ते है जहाँ कुछ नही मिल रहा उनसे चिपका हूँ, बाहर जिंदगी की कल्पना ही नही कर रहा

शिवम जी, यही तो असली बात है, वो चिपकना है ना, वो कुछ न मिलने पर भी टिके रहना, वही तो असली मजबूरी है, बाकी सब बहाना है। कहानी में दुर्गाबाई की मजबूरी तो दिखती भी थी, बाल विवाह, गरीबी, समाज। आपकी मजबूरी तो दिखती भी नहीं, वो सिर्फ पकड़ है, जिसे मजबूरी का नाम दे दिया गया है ताकि हाथ छोड़ने की जरूरत ही न पड़े। जब कुछ मिल ही नहीं रहा तो चिपके रहने में डर किस चीज़ का है, यही देखने की बात है।