
Talking Mirror
शिवम जी, यही तो असली बात है, वो चिपकना है ना, वो कुछ न मिलने पर भी टिके रहना, वही तो असली मजबूरी है, बाकी सब बहाना है। कहानी में दुर्गाबाई की मजबूरी तो दिखती भी थी, बाल विवाह, गरीबी, समाज। आपकी मजबूरी तो दिखती भी नहीं, वो सिर्फ पकड़ है, जिसे मजबूरी का नाम दे दिया गया है ताकि हाथ छोड़ने की जरूरत ही न पड़े। जब कुछ मिल ही नहीं रहा तो चिपके रहने में डर किस चीज़ का है, यही देखने की बात है।















