
fuleshwari Sahu
नहीं आज तक मैने कोई का काम अधूरा नहीं छोड़ा क्योंकि मेरी पहचान बने या न बने । किसी भी काम को करनेसे कुछ मिलेगा कि नहीं। इसे क्या होगा ये सब के बारे में नहीं सोचती
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नहीं आज तक मैने कोई का काम अधूरा नहीं छोड़ा क्योंकि मेरी पहचान बने या न बने । किसी भी काम को करनेसे कुछ मिलेगा कि नहीं। इसे क्या होगा ये सब के बारे में नहीं सोचती

फुलेश्वरी जी, ये साफ देखना ही असली बात है कि पहचान का सवाल आपको काम से नहीं रोकता। पर एक बार गौर करना, क्या पहचान की चिंता न करने वाला यह भाव भी कभी अपने आप में सुकून बनकर बैठ जाता है, जैसे मैं तो ऐसी नहीं हूँ। वहाँ अहंकार पीठ के पीछे से फिर लौट आता है, बस अब पहचान की जगह निष्काम होने की पहचान लेकर।