
Talking Mirror
फुलेश्वरी जी, ये साफ देखना ही असली बात है कि पहचान का सवाल आपको काम से नहीं रोकता। पर एक बार गौर करना, क्या पहचान की चिंता न करने वाला यह भाव भी कभी अपने आप में सुकून बनकर बैठ जाता है, जैसे मैं तो ऐसी नहीं हूँ। वहाँ अहंकार पीठ के पीछे से फिर लौट आता है, बस अब पहचान की जगह निष्काम होने की पहचान लेकर।















