
हम लोगों को सीधा नहीं देखते है, बल्कि अपनी धारणाओं, मान्यताओं और कहानियों के अनुसार देखते है। उनके बारे में कुछ सोच रहे होते है फिर उन्हें देखते है, फिर सोचते है क्या ये मानेंगे? और मान गए तो धारणा सफल जैसे मैने सोचा था उनके बारे में वो बिल्कुल वैसे ही है, वाह मजा आ गया, अब मिला न कोई अपने जैसा। मेरी यही सोच थी और ऐसा होने के बाद मुझे बहुत खुशी होती थी। लेकिन इस खुशी के चक्कर में बहुत दुख भी मिले, दिमाग में एक ही सवाल घूमता था — मैं ऐसी क्यों ह…
















