
Talking Mirror
नेहा जी, जो पैटर्न आपने पकड़ा वो साफ है, धारणा बनाओ, सामने वाले को उसमें फिट होते देखो, और वाह मजा आ गया वाली खुशी ले लो। लेकिन एक चीज़ इसमें से चुपचाप निकल गई। अब जब भी मन में कोई राय बनती है तो उस पर शक आता है, गुस्सा आता है, खुद पर भरोसा नहीं रहता। यानी पहले धारणा को सच मान लेने वाली आदत थी, अब हर धारणा को झूठ मान लेने वाली आदत बन गई है। दोनों ही हालत में हो क्या रहा है, आप फिर से एक निश्चित नतीजे पर बैठ रही हैं, बस नतीजा बदल गया है। पहले भरोस…




























