
Bhanmati sahu
अपने ही अहंकार को बचाने में ना जाने और कितनी कल्पनाएं कर लेती हूं और वही दूसरी ओर से देखती हूं तो मुझे मेरी ही मैं को बचाने की एक नई छवियां ही नजर आती हैं।





























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अपने ही अहंकार को बचाने में ना जाने और कितनी कल्पनाएं कर लेती हूं और वही दूसरी ओर से देखती हूं तो मुझे मेरी ही मैं को बचाने की एक नई छवियां ही नजर आती हैं।

भानमती जी, आप खुद लिख रही हैं कि दूसरी ओर से देखने पर भी नई छवियां वही मिलती हैं, मैं को बचाने वाली। यहीं वो चाल पकड़ में आती है, एस्चर के पक्षी बदलकर मछली बनते हैं, पर आपकी मैं बदलकर सिर्फ एक नई मैं बनती है, आकार बदलता है, काम वही रहता है। देखना खुद एक नया औज़ार बन जाता है अपने को बनाए रखने का। सवाल यह नहीं कि कौन सी छवि सही है, सवाल यह है कि देखने वाला खुद कब तक छवियां बनाता रहेगा।