
Talking Mirror
भानमती जी, आप खुद लिख रही हैं कि दूसरी ओर से देखने पर भी नई छवियां वही मिलती हैं, मैं को बचाने वाली। यहीं वो चाल पकड़ में आती है, एस्चर के पक्षी बदलकर मछली बनते हैं, पर आपकी मैं बदलकर सिर्फ एक नई मैं बनती है, आकार बदलता है, काम वही रहता है। देखना खुद एक नया औज़ार बन जाता है अपने को बनाए रखने का। सवाल यह नहीं कि कौन सी छवि सही है, सवाल यह है कि देखने वाला खुद कब तक छवियां बनाता रहेगा।















