
1. सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द यहाँ “सकारात्मक” का अर्थ है—ऐसे शब्द जो सत्य के बारे में कोई विधेयात्मक संकेत देते हैं, जैसे सत्, चित्, आनन्द, अनन्त। “नकारात्मक” का अर्थ है— जो किसी सीमित पहचान या अवधारणा को हटाते हैं, जैसे नेति-नेति, अकर्ता, अभोक्ता आदि। सत्य की ओर संकेत करने वाले सकारात्मक शब्द 1 ब्रह्म परम वास्तविकता 2 आत्मा स्व/आत्मस्वरूप 3 सत् अस्तित्व/सत्ता 4 चित् चेतना 5 आनन्द आनन्द 6 सत्य सत्य/वास्तविक 7 ज्ञान ज्ञान 8 अनन्त अनंत 9 अक्षर जो क्षरित न हो 10 अमृत अमर/अविनाशी 11 पूर्ण पूर्णता 12 शान्त शांति 13 प्रकाश प्रकाश/स्वप्रकाशता 14 चैतन्य चेतन सत्ता 15 प्रज्ञा प्रज्ञा/बोध 16 विज्ञान विशिष्ट बोध 17 आनन्दमय आनन्द से संबद्ध 18 स्वरूप अपना वास्तविक रूप 19 पुरुष चेतन पुरुष 20 साक्षी देखने वाला/साक्षी 21 द्रष्टा देखने वाला 22 प्रत्यगात्मा अंतर्मुख आत्मा 23 परमात्मा परम आत्मा 24 सच्चिदानन्द सत्-चित्-आनन्द 25 स्वयंज्योति स्वयं प्रकाशित 26 कूटस्थ अचल/अपरिवर्तनशील 27 अविनाशी जिसका विनाश न हो सत्य की ओर संकेत करने वाले नकारात्मक शब्द 28 अज अजन्मा 29 अकर्ता कर्ता नहीं 30 अभोक्ता भोक्ता नहीं 31 असंग संग से रहित 32 निर्गुण गुणों से परे 33 निराकार आकार से रहित 34 निरुपाधिक उपाधि से रहित 35 निर्विकार बविकार से रहित 36 निष्कल कलाओं/भागों से रहित 37 निष्क्रिय क्रिया से रहित 38 निरंजन अंजन/मल से रहित 39 निर्मल मल से रहित 40 निष्प्रपञ्च प्रपंच से रहित 41 अद्वैत द्वैत नहीं 42 अदृश्य दृश्य नहीं 43 अग्राह्य ग्रहण न किया जा सके 44 अलक्षण किसी लक्षण से सीमित नहीं 45 अव्यय जिसका क्षय न हो 46 अविकारी परिवर्तन से रहित 47 अशरीर शरीर से रहित 48 नेति-नेति “यह नहीं, यह नहीं” 49 अनेजत् जो चलता/कंपित नहीं 50 अप्रमेय जिसे प्रमाणित/मापा न जा सके 2. मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? मेरी भाषा सामान्यतः सकारात्मकता की ओर अधिक जाती है। लेकिन इसमें एक खतरा है। अगर मैं कहता हूँ कि सत्य = शांति, तो अगला प्रश्न होगा—“वह शांति मुझे कैसे मिले?” फिर शांति एक उपलब्धि बन जाती है। अगर मैं कहूँ सत्य = आनंद, तो आनंद पाने की इच्छा पैदा हो सकती है। अगर कहूँ सत्य = प्रकाश, तो मन उस प्रकाश की कोई कल्पना बनाने लगेगा। यानी सत्य की ओर इशारा करने वाला शब्द ही फिर सत्य को पाने की वस्तु बना देता है। इसलिए मेरे लिए नकार की भाषा अधिक सावधान भाषा लगती है। “मैं यह नहीं हूँ”, “यह भी अंतिम नहीं है”, “जो मैं पकड़ रहा हूँ, वह सत्य नहीं है”—ये वाक्य मुझे किसी नई वस्तु को पकड़ने के बजाय अपनी पकड़ को देखने के लिए मजबूर करते हैं। यहीं नेति-नेति की बात बहुत गहरी लगती है। वह मुझे सत्य की कोई तस्वीर नहीं देती; वह मेरी बनाई हुई तस्वीरों को एक-एक करके हटाती है। मेरे अनुसार नकार की भाषा अधिक उपयोगी है। क्योंकि सकारात्मक भाषा बहुत आसानी से अहंकार के लिए एक नया लक्ष्य बना देती है।


















