
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने वाले 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं। ब्रह्म, आत्मा, सत्य, चैतन्य, साक्षी, आनंद, शांति, पूर्णता, अनंत, निर्विकार, निराकार, निर्गुण, अद्वैत, अमृत, तत्त्व, परम, पुरुष, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, मुक्ति, मोक्ष, कैवल्य, निर्वाण, स्वतंत्रता, समत्व, सहजता, मौन, प्रकाश, ज्योति, अस्तित्व, सत्, चित्, शुद्धता, पवित्रता, अभय, असीमता, अखंडता, नित्यता, अविनाशी, अकर्ता, अभोक्ता, असंग, नेति-नेति, तुरीय, परमात्मा, सच्चिदानंद, ऋत, स्व-रूप। इनमें कुछ शब्द सत्य को *सकारात्मक रूप में बताते हैं, जैसे आनंद, शांति, पूर्णता, प्रकाश, स्वतंत्रता आदि। लेकिन कई शब्द यह बताते हैं कि सत्य क्या नहीं है*, जैसे निराकार, निर्गुण, निर्विकार, असंग, अकर्ता और नेति-नेति। इसलिए वेदांत में नकार का प्रयोग काफी महत्वपूर्ण दिखाई देता है। 2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है? जब मैं सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा नकार की ओर अधिक जाती है। क्योंकि सत्य को किसी वस्तु की तरह ठीक-ठीक बताया नहीं जा सकता। जैसे ही मैं कहती हूँ कि सत्य ऐसा है या वैसा है, मन उसकी एक तस्वीर बना लेता है और अहंकार उसी तस्वीर को पकड़कर उसे एक नया विषय बना लेता है। इसके बजाय अपने भीतर जो गलत है, उसे पहचानना आसान है। जैसे—मेरा डर सत्य नहीं है, मेरी लालसा मुझे स्थायी तृप्ति नहीं दे सकती, मेरी धारणाएँ गलत हो सकती हैं। इस तरह “नेति-नेति” मुझे बाहर कुछ पाने के बजाय अपने भीतर देखने के लिए प्रेरित करता है। मुझे लगता है कि नकार इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हम अपनी पुरानी इच्छाओं, मान्यताओं और सहारों को आसानी से छोड़ना नहीं चाहते। हम सत्य को पाना चाहते हैं, लेकिन अपने पुराने सहारे भी पकड़े रखना चाहते हैं। इसलिए पहले यह देखना जरूरी है कि मैं किन चीज़ों को पकड़े बैठी हूँ और क्या वे वास्तव में मुझे शांति दे रही हैं। इसलिए मेरे लिए सत्य की ओर बढ़ना किसी नई चीज़ को हासिल करना नहीं, बल्कि जो झूठा है उसे पहचानकर धीरे-धीरे छोड़ना है। “यह नहीं, यह भी नहीं” मुझे उसी दिशा में ले जाता है।


















