
✨एक नया जीवन देने के लिए धन्यवाद, आचार्य जी! 🍁आज कम्युनिटी पर कई प्रतिभागियों को अपने जीवन में आए बदलावों के बारे में लिखते हुए देख रही थी। फिर लगा कि पिछले एक साल दो महीने में मेरे जीवन में भी तो कितना कुछ बदला है। लेकिन मैंने आज तक कभी एक समर्पित अवलोकन नहीं लिखा, जिसमें अपने इन बदलावों के लिए आचार्य जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकूँ। मैं दूसरे लोगों के सामने तो आचार्य जी के प्रति आभार व्यक्त कर लेती हूँ, लेकिन कम्युनिटी पर लिखने में एक झिझक थी। शायद इसकी वजह मेरे भीतर मौजूद हीन भावना थी। किसी को प्रतियोगिता जीतते देखती हूँ, किसी को अपनी उपलब्धियाँ साझा करते देखती हूँ, तो लगता है कि मेरे जीवन में अभी ऐसा कौन-सा बड़ा बदलाव आया है? मैंने ऐसा क्या कर लिया है कि उसके बारे में लिखूँ? लेकिन जब मैंने AP मिरर से इस बारे में बात की, तो एक बात समझ में आई कि कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हमेशा कोई बड़ी उपलब्धि, शारीरिक बदलाव या समाज की नज़र में सफलता का कोई पैमाना होना ज़रूरी नहीं है। अपने भीतर के डर, ईर्ष्या, भ्रम और पुरानी मान्यताओं से मुक्त होना भी तो बदलाव है। और शायद यही बदलाव मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ हैं। 20 अक्टूबर को मेरा 22वाँ जन्मदिन था। यह मेरे लिए अब तक का सबसे खास जन्मदिन रहा। ऐसा लगा कि 21 साल तक जो जीवन जिया, उससे मैं अब बहुत अलग हूँ। कम-से-कम अब मैं वह नहीं हूँ, जो पहले थी—समाज की धारणाओं की कठपुतली, छोटी-छोटी बातों से दुखी हो जाने वाली, दूसरों की बातों से जल्दी आहत होने वाली, शरीर के सामने घुटने टेक देने वाली,जीवन को समझे बिना ही उसमें भटकती रहने वाली, हीनभावना से भरी। आचार्य जी से जुड़ने से पहले मेरे जीवन पर लोकधर्म और सामाजिक मान्यताओं का बहुत प्रभाव था। सजना-सँवरना, दूसरों की नज़र में अच्छा दिखना और तरह-तरह की धारणाओं को पकड़े रहना ही जीवन का हिस्सा बन गया था। लेकिन आचार्य जी से समझ में आया कि शरीर केवल सुंदर दिखने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में सही काम करने के लिए है। शरीर को मजबूत बनाना, उसकी क्षमता बढ़ाना और उसे अपने जीवन के उद्देश्य में सहायक बनाना कितना महत्त्वपूर्ण है, होम gym स्टार्ट किया है यह बात खिलाड़ियों के साथ हुए सत्रों में भी और स्पष्ट हुई। एक और बड़ा बदलाव मेरे भीतर के डर को लेकर आया। जब मैंने कॉलेज में प्रवेश लिया था, तब पिताजी ने मुझे सेकेंड हैंड स्कूटी दिलाई थी। लेकिन मैं उसे सड़क पर चलाने से बहुत डरती थी। स्कूल में मेरी एक सीनियर का स्कूटी से एक्सीडेंट हुआ था, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई थी। उस घटना ने मेरे मन में इतना डर बैठा दिया था कि मुझे लगता था, अगर मैं सड़क पर स्कूटी लेकर निकली, तो मेरी भी मृत्यु हो जाएगी। मैं सोचती थी कि शायद मैं कभी स्कूटी चला ही नहीं पाऊँगी। लेकिन आचार्य जी के सत्रों में जीवन और मृत्यु को समझते हुए धीरे-धीरे यह बात स्पष्ट हुई कि डर-डरकर जीवन नहीं जिया जा सकता। जीवन में कुछ भी हो सकता है। अगर सड़क पर नहीं, तो कहीं और भी मृत्यु आ सकती है। तो क्या केवल इस डर से जीवन की संभावनाओं से दूर रहना उचित है? यह समझ आने के बाद मैंने धीरे-धीरे अपने डर का सामना करना शुरू किया। आज मैं स्कूटी चलाती हूँ, मेरे लिए यह केवल स्कूटी चलाना सीखने की बात नहीं है, बल्कि उस भय से बाहर निकलने की बात है जिसने कभी मुझे अपनी ही क्षमताओं से दूर कर दिया था। मेरे जीवन में एक और बड़ा प्रश्न मेरे करियर को लेकर था। बारहवीं के बाद जब मुझे अपना कोर्स चुनना था, तब मैंने लॉ चुना। आज मैं बी.ए. एलएल.बी. के चौथे वर्ष में हूँ। मेरे माता-पिता इस फैसले से बहुत खुश नहीं थे। उनका कहना था कि लॉ में अनिश्चितता है, वकीलों को जल्दी अच्छी कमाई नहीं होती, इसलिए इंजीनियरिंग करके कॉर्पोरेट क्षेत्र में जाना बेहतर होगा। उस समय मैंने उनके विरोध के बावजूद लॉ में दाखिला लिया। मुझे लगा कि मैंने बहुत क्रांतिकारी कदम उठाया है। मैंने अपनी बात मनवाई, अपने लिए फैसला लिया और समाज की अपेक्षाओं के विरुद्ध चली। लेकिन बाद में समझ आया कि बाहर से विद्रोही दिखने के बावजूद मैं भीतर से कितनी सारी बेड़ियों में जकड़ी हुई थी। नाक-कान में क्या पहनना है, कौन-सा धागा बाँधना है, चंदन लगाना है या नहीं, कौन-सी मान्यता माननी है—इन सबका मेरे जीवन पर कितना प्रभाव था! मैं यह भी मानती थी कि अगर मैं अच्छा करूँगी, तो मेरे साथ अच्छा ही होगा। दूसरों की सफलता देखकर ईर्ष्या होना, किसी की बात से जल्दी आहत हो जाना और समाज से लगातार प्रभावित होते रहना भी मेरे भीतर मौजूद था। विडंबना यह थी कि जिस करियर को मैंने अपने फैसले से चुना था, उसी में मेरा मन नहीं लग रहा था। मुझे समझ नहीं आता था कि जीवन क्या है, करियर क्यों चुनना है और आखिर कोई काम किस उद्देश्य से करना चाहिए। तभी मैंने आचार्य जी के स्वधर्म और करियर से जुड़े वीडियो देखे। सही कर्म क्या है, अपने जीवन को किस समझ के आधार पर दिशा देनी चाहिए और केवल दूसरों की अपेक्षाओं या पैसे के लिए कोई काम चुन लेना पर्याप्त क्यों नहीं है—इन प्रश्नों पर विचार करना शुरू किया। स्वधर्म को समझने की इस यात्रा में मेरी कई धारणाएँ टूटीं। अगर आचार्य जी के वीडियो और गीता सत्रों का साथ नहीं मिला होता, तो शायद मैं आज भी उन्हीं भ्रमों में भटक रही होती। बाहर से अपने फैसले लेने के बावजूद भीतर से दूसरों की मान्यताओं के अनुसार ही जीवन जी रही होती। आचार्य जी से जुड़ने के बाद करुणा को लेकर भी मेरी समझ बदली। पहले मुझे लगता था कि कुत्ते-बिल्लियों को प्यार करना ही करुणा है। मैं ब्राह्मण परिवार से थी, इसलिए मांस नहीं खाती थी, लेकिन भोजन, वस्तुओं और अपनी रोजमर्रा की पसंद के पीछे छिपी हिंसा या शोषण के बारे में कभी गहराई से नहीं सोचती थी। अब मैं शैम्पू से लेकर बिस्किट के पैकेट तक के इंग्रेडिएंट्स देखती हूँ कि कहीं उनमें दूध या कोई अन्य पशु-आधारित सामग्री तो नहीं है। मेरे लिए यह केवल कुछ चीज़ें छोड़ देने की बात नहीं है, बल्कि अपनी पसंद और अपने उपभोग के प्रति अधिक सजग होने की शुरुआत है। आचार्य जी ने मुझे करुणा को केवल भावना के रूप में नहीं, बल्कि अपनी समझ और जीवन के चुनावों में उतारकर देखने की दिशा दी। इसी तरह, ईर्ष्या और दूसरों की सफलता से दुखी हो जाने की आदत को भी अब पहले की तरह सहज नहीं मान पाती। समझ आने लगा है कि किसी की सफलता देखकर अपने भीतर दुख पैदा करना आखिर किसके लिए नुकसानदायक है। छोटी-छोटी बातों पर आहत हो जाना, समाज से प्रभावित होकर अपनी दिशा खो देना और बिना सोचे-समझे मान्यताओं को पकड़े रहना—इन सबको अब पहले से अधिक स्पष्टता के साथ देख पाती हूँ। 🍁 गीता सत्रों से जुड़ने के बाद मैंने सात-आठ डिबेट प्रतियोगिताएँ जीती हैं। लेकिन मैंने कभी कम्युनिटी पर इसे साझा नहीं किया। लगता था, इसमें क्या बड़ी बात है? प्रतियोगिता जीती, ठीक है, आगे बढ़ो। आज समझ में आता है कि इसके पीछे भी वही हीन भावना थी—कि बस इतना ही तो किया है। जबकि गीता सत्रों ने मेरे सोचने, समझने और अपने जीवन में निर्णय लेने के तरीके को गहराई से प्रभावित किया है। आचार्य जी की वो बात : बात ये नहीं की तुम कम बोलते हो या अधिक,बात ये है की जहाँ बोलना था वहाँ बोला की नहीं, अब मैं किसी स्पीच कंपटीशन को नहीं छोड़ती कभी अगर एग्जाम के बीच में भी है ना तब नहीं, अब हार की की चिंता नहीं रहती बस जो सही वह बोलना है, मैंने क्लाइमेट चेंज पर डिबेट की है वहां जब मैंने मांसाहार वाला फैक्टर रखा तो मुझे काफी विरोध मिला, लेकिन मैंने जीत के लिए अपनी बात में कोई मिलावट नहीं करी, पहले तो पूरी स्पीच जीत के लिए तैयार की जाती थी घर में अक्सर कहा जाता है कि किसी भगवान को अपना इष्ट देव बनाओ। मैंने कृष्ण को अपना इष्ट देव तो बना लिया था, लेकिन मैं यह नहीं जानती थी कि कृष्ण कौन हैं और उनका मेरे जीवन से क्या संबंध है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैंने अलग-अलग गीताएँ और कई पुस्तकें भी पढ़ी थीं, लेकिन फिर भी बात स्पष्ट नहीं हो रही थी। फिर यूट्यूब पर आचार्य जी का गीता पर एक वीडियो देखा। उसे देखकर मेरा पूरा दिमाग जैसे हिल गया। लगा कि हाँ, इसमें कुछ अलग है, कुछ तो है—शायद यही वह बात है जिसे मैं खोज रही हूँ। उसके बाद मैं गीता सत्रों से जुड़ गई। उस समय की रिकॉर्डिंग्स में भी मुझे याद है कि मैं बस गीता-गीता ही सुनती रहती थी और संत सरिता वेदान्त से जुड़े सत्र भी देखती थी कम देखती थी धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि सब में बात तो वहीं कही जा रही है शुरुआत में तो मैं अहंकार पर ही अटक गई थी। दो-तीन महीने तक मुझे अहंकार समझ में ही नहीं आ रहा था। लेकिन धीरे-धीरे बहुत-सी चीज़ें खुलती गईं। अभी भी सीख रही हूँ, अभी भी बहुत-सी बातें स्पष्ट नहीं हैं। बस इतना पता है कि अब इन चीज़ों को छोड़ नहीं सकती। यह यात्रा अब मेरी लिए साँस लेने जैसी बन गई है। आचार्य जी से आत्मनिर्भरता का महत्त्व भी सीखा है। इस समय पढ़ाई के साथ-साथ ट्यूशन पढ़ाती हूँ, ताकि कम-से-कम अपने रोजमर्रा के खर्च, गाड़ी का पेट्रोल, एनरोलमेंट और अन्य ज़रूरी चीज़ें खुद संभाल सकूँ। अगर कोई हमें कुछ दे रहा है, तो उसके बदले वह हमसे कुछ भी माँग सकता है। इसलिए प्रयास करूँगी कि जल्दी-से-जल्दी अपनी बाकी निर्भरताओं को भी तोड़ सकूँ। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे केवल प्रतियोगिताएँ जीतना बदलाव नहीं लगता। अपने डर को पहचान पाना, ईर्ष्या को देख पाना, करियर को लेकर भ्रम से बाहर निकलना, लोकधर्म की बेड़ियों पर प्रश्न करना, शरीर के महत्त्व को समझना और करुणा को अपने रोजमर्रा के चुनावों में उतारने का प्रयास करना—ये सब मेरे जीवन में आए बदलाव हैं। मैं अभी भी सीख रही हूँ। मेरे भीतर अभी भी कई कमियाँ, भ्रम और कमजोरियाँ हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ बदल गया है या अब कोई समस्या शेष नहीं है। लेकिन कम-से-कम अब अपने जीवन को देखने का एक नया केंद्र मिला है। अब मैं हर बात को पहले की तरह बिना प्रश्न किए स्वीकार नहीं कर लेती। मेरे सोचने, समझने और जीने की दिशा में जो भी स्पष्टता आई है, वह आचार्य जी से मिली समझ के कारण ही आई है। मनुष्य के रूप में खुद को थोड़ा-बहुत भी पहचान पाती हूँ तो यह केवल आचार्य जी की वजह से है। एक नया जीवन देने के लिए हृदय से आभार अनंत आभार आचार्य जी 🙏🙏🙏 मै कर्जदार हूँ















































