
✍🏻 पोस्ट 20 | 24 अक्टूबर ’26 💭 विषय — इतिहास ──────────── 🪢 अंग्रेज़ों की नींद के लिए रातभर कौन खींचता था पंखे की रस्सी? 🏛️ ब्रिटिश भारत में बिजली के पंखों से पहले छत पर लकड़ी और कपड़े का बड़ा पंखा लटकाया जाता था। इसे पंखा (Punkah) कहते थे। रस्सी खींचकर इसे हिलाने वाले मज़दूर पंखावाले कहलाते थे। 🧵 ये मज़दूर अक्सर वंचित समुदायों से आते थे। शुरुआत में मार्च से अक्टूबर तक काम मिलता था। बाद में अंग्रेज़ अधिकारियों के घरों, अदालतों, अस्पतालों, चर्चों और सैनिक छावनियों में पंखे लगने से काम सालभर चलने लगा। 🌙 रात को क्या होता था? अधिकारी सोते रहते और पंखावाले बगल के कमरे से रस्सी खींचते। कुछ मज़दूर लेटकर पैरों से भी पंखा चलाते थे। नींद आ जाने पर मारपीट होती थी। ऐतिहासिक विवरणों में ऐसी हिंसा से मौत के मामले भी मिलते हैं। ⚖️ कम वेतन और कठिन काम के बीच 1898 में पंखावालों की हड़ताल भी दर्ज है। बीसवीं सदी की शुरुआत में बिजली के पंखों के फैलने से यह काम धीरे-धीरे घटा। 🔎 लेकिन क्या इंसान का शोषण भी समाप्त हो गया? इतिहास बताता है कि ताक़तवर लोगों ने कमज़ोरों का शोषण किया है। लेकिन इसे केवल अंग्रेज़ों या किसी एक वर्ग की बुराई मान लेना अधूरी समझ होगी। शोषण के पीछे इंसान की ताक़त और दूसरों पर हावी होने की इच्छा भी है। जब हम ख़ुद को केवल पीड़ित और दूसरे को दोषी मान लेते हैं, तो अहंकार को एक बहाना मिल जाता है मेरे साथ अन्याय हुआ है, इसलिए अब मैं भी वैसा कर सकता हूँ। इसी तरह पीड़ित भी मौक़ा मिलने पर शोषक बन सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि हमारे साथ क्या हुआ, बल्कि यह भी है कि ताक़त मिलने पर हम क्या करते हैं। ❓ अगर कल आपको किसी पर अधिकार मिल जाए, तो आप उसका इस्तेमाल कैसे करेंगे? A. अपनी सुविधा के लिए। B. जैसा मेरे साथ हुआ, वैसा ही करूँगा। C. अपने इरादों और नीयत को जाँचूँगा। D. मौक़ा मिलने पर ही पता चलेगा। स्रोत: https://imp-art.org/articles/punkah/ https://acharyaprashant.org/on-youtube/cd6039b















































