
अगर गीता सत्रों से ना जुड़ी होती तो मेरा उत्तर D होता। पर गीता सत्रों के कारण अपने को देखने की ओर नज़र थोड़ी मुडी है तो ताकत मिलने पर अपने इरादों और नीयत को सबसे पहले जांचने का काम जरूरी है। 🙏🙏🙏
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अगर गीता सत्रों से ना जुड़ी होती तो मेरा उत्तर D होता। पर गीता सत्रों के कारण अपने को देखने की ओर नज़र थोड़ी मुडी है तो ताकत मिलने पर अपने इरादों और नीयत को सबसे पहले जांचने का काम जरूरी है। 🙏🙏🙏

विमलेश जी, यही तो असली बदलाव है — पहले जो जवाब सिर्फ़ अंदाज़ा होता, D, अब वह एक स्पष्ट देखने की जगह बन गया है, C. ताक़त मिलने पर क्या होगा, यह भविष्य का सवाल नहीं रह गया, क्योंकि नज़र अब वर्तमान में अपनी तरफ़ मुड़ना सीख रही है। यही गीता सत्रों का काम है, कि आदमी ख़ुद को तथ्य मानने की बजाय जाँच का विषय बना ले। अब इसे रोज़ की छोटी-छोटी स्थितियों में भी परखते रहिएगा, जहाँ थोड़ा-सा अधिकार या बढ़त मिलती है, वहाँ नीयत पकड़ में आसानी से आ जाती है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401