
✍🏻 पोस्ट 8 | 7 अक्टूबर '26 💭 विषय — मानव उत्कृष्टता ────────── 🩺 युद्ध के बीच चीन में रुक गया एक भारतीय डॉक्टर 🌏 1938 में चीन जापानी आक्रमण से जूझ रहा था। घायल सैनिकों के इलाज के लिए भारत से पाँच डॉक्टरों की मेडिकल टीम चीन भेजी गई। उनमें महाराष्ट्र के सोलापुर के 28 वर्षीय डॉक्टर द्वारकानाथ कोटणीस भी थे। 🏥 चीन पहुँचने के बाद कोटणीस सिर्फ किसी अस्पताल में बैठकर मरीज देखने तक सीमित नहीं रहे। वे मोबाइल क्लीनिकों के साथ युद्ध की अलग-अलग जगहों तक जाते थे। इन अस्थायी चिकित्सा केंद्रों में घायल सैनिकों की पट्टियाँ बदली जातीं, घावों का इलाज होता और जरूरत पड़ने पर ऑपरेशन किए जाते। दवाइयाँ और चिकित्सा सामग्री कम थीं, इसलिए सीमित साधनों में ही काम करना पड़ता था। ⚕️ 1940 की एक लंबी लड़ाई के दौरान उन्होंने लगातार लगभग 72 घंटे ऑपरेशन किए। 13 दिनों में उन्होंने 800 से अधिक घायल सैनिकों का इलाज किया। बाद में वे डॉ. बेथ्यून इंटरनेशनल पीस हॉस्पिटल के निदेशक बने और चिकित्सा का काम जारी रखा। 🤝 टीम के दूसरे डॉक्टर धीरे-धीरे भारत लौट गए, लेकिन कोटणीस चीन में ही रहे। उन्होंने चीनी भाषा सीखी, चीनी नर्स गुओ छिंगलान से विवाह किया और वहीं अपना जीवन जारी रखा। 9 दिसंबर 1942 को 32 वर्ष की उम्र में मिर्गी के दौरे के कारण उनका निधन हो गया। 🔎 लेकिन इस कहानी को सिर्फ त्याग या बहादुरी की कहानी बनाकर छोड़ देना आसान है। असली सवाल मदद को लेकर है। हम किसी की मदद करते समय क्या देख रहे होते हैं? सामने वाले की जरूरत, या अपनी? 💭 अगर मदद करने के बाद हमें बदले में धन्यवाद, सम्मान, पहचान या अपने बारे में अच्छा महसूस करना जरूरी हो जाए, तो क्या वह मदद सच में मदद रह जाती है? 🌱 मदद का मतलब सिर्फ किसी के लिए कुछ कर देना नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि हमारी मदद सच में उसके काम आ रही है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सामने वाले की जरूरत से ज्यादा हमें अपने अच्छे होने का एहसास जरूरी है? ❓ इसलिए सवाल यह नहीं कि “मैं दूसरों के लिए कितना करता हूँ?” सवाल यह है: “जिसे मैं मदद कह रहा हूँ, उसमें सचमुच सामने वाले का भला है, या उसमें मेरा ‘मैं’ भी कुछ पाने आया है?” 🔗 स्रोत https://en.wikipedia.org/wiki/Dwarkanath_Kotnis?















































