
जब मैं किसी की मदद करती हु, तो जिसका मैने मदद किया है। उसको बिना जाने की ओ मेरी मदद करेगा भी नहीं, मै अपने आप ही मन लेती हु, कि वो मेरा अब मदद करेगा। जब जरूरत करेगा जैसे लगता है, कि मैने उसका मदद की तो अब उसके ऊपर हक बन गया है। और उम्मीद हो गई है, कि वो मेरी मदद करेगा । इससे ये पता चलता है, कि मैने उसका मदद तो किया ही नहीं मैने तो अपने लिय मदद की हु। कि आगे चल कर उससे मदद की उम्मीद रहेगी। ओर यही हम छोटे से देखते आ रहे हैं। और घर में भी यही देखा है। और अगर किसी की मदद की हो अगर वो मदद न करे तो , हम उसे एहसान फरामोश बोल देते है। जबकि सामने वाले ने हमसे भी मदद नहीं मांगी, हमने ही जाके उसकी मदद की है। क्योंकि मुझे सबकी नजर में अच्छा बनाना था। बाद में इल्जाम भी उसी पे लगा रहे है। कि वो एहसास फरामोश है। मतलब अंहकार अपने आप को खुश करने के लिए कुछ भी कर सकता है किसी की मदद ,भी और किसी की बुराई ,भी बस अहंकार अपने आप को खुश रखना चाहता है। उसे किसी से ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता।


















