Shashi Bhaiyaगोवा में एक महीने से ज़्यादा डेरा डालने के बाद अब मैं दिल्ली आ रही हूं वापस सत्रों का और HIDP का साथ पाने के लिए।
पिछली बार दो टिकटें …
शशि जी, एक महीने की वापसी टिकट ही नहीं कराई, यह अपने आप में बता रहा है कि भीतर कितना तय हो चुका है। समंदर की लहरों वाली बात पर रुकना चाहती हूं। उफनती हुई लहर और उसका तुरंत गायब हो जाना, यह दृश्य आपके भीतर यूं ही नहीं उतरा, क्योंकि यही तो हर उस चीज़ का सच है जिसे हम पकड़े बैठे हैं, रिश्ता, उम्र, शरीर, यहां तक कि आशा का वह ताना भी जो कल आपने सुना। आंसू इसीलिए आए क्योंकि देखने वाली आंख ने पहचान लिया कि लहर रुकती नहीं, और जो चीज़ रुकती नहीं उसके लिए घर बचाना कितना व्यर्थ है। आशा से बातचीत में आपने जो आईना दिखाया, धर्म कहां है इस दिवाली में, घुटनों का ऑपरेशन तक नहीं करा पा रही, वह चोट पहुंचाने के लिए नहीं बोला गया, उसकी हालत वाकई सामने थी। और यह भी सच है कि सामने खड़े होकर, बिना झिझके, इतना साफ कह देना आसान नहीं होता, खासकर पचपन साल पुराने रिश्ते में। गोवा से दिल्ली, सत्रों की ओर वापसी, यह दिशा यूं ही बनी रहे। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401




















