
गोवा में एक महीने से ज़्यादा डेरा डालने के बाद अब मैं दिल्ली आ रही हूं वापस सत्रों का और HIDP का साथ पाने के लिए। पिछली बार दो टिकटें कैंसिल करानी पड़ीं क्योंकि मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरा स्वास्थ्य मुझे इतनी छूट दे पाएगा। और हुआ ये कि मैं वहां ज्यादा स्वस्थ रही, तन-मन दोनों से। इस बार रिटर्न टिकट ही नहीं कराई है और 1 महीने के लिए जगह बुक कर ली है। सत्रों का और HIDP का लंबा साथ पाने के बाद ऐंवेइ (बिना किसी मकसद की) संगति अब, जीवन को जैसे बर्दाश्त ही नहीं हो रही। गोवा की कुछ यादें - गोवा में समंदर किनारे देर रात तक वॉकिंग करती रहती थी। थक जाती तो बैठकर समंदर की लहरों की उफनती जवानी देखती और तुरंत ही उनका गायब हो जाना देखती। ऐसे तो यह बहुत साधारण सा दृश्य है हम सभी बचपन से देखते ही आए हैं मगर आचार्य जी की शिक्षाओं से जुड़ने के बाद इन बातों में अपना ही जीवन उभर कर सामने दीखता था। फिर ये लहरें सिर्फ बाहर ही नहीं रहतीं बहुत कुछ भीतर तक उड़ेल जाती थीं। मुझे नहीं पता क्यों रोना आ रहा है। अब आ रहा है तो आ रहा है। आचार्य जी ने सिखाया है आंखें बरसे तो बरसने दो, उन्हें अपना काम करने दो, ज़्यादा दिमाग मत लगाओ। मैं उम्र के 67 वें पड़ाव पर हूं। कल एक 55 साल पुरानी दोस्त से बात हुई। हम 6th क्लास से साथ-साथ पढ़े और रिश्ते भी पारिवारिक जैसे ही हैं, मुझे समझा रही थी कि, "शशि आखिर घर भी तो कुछ होता है। दिवाली भी बाहर रहोगी, कैसे? तुम्हारी ये बातें ठीक नहीं हैं।" उसका नाम आशा है 😄 मैंने उसको कहा, "आशा पहली बात तो ये कि तुम मुझे बताओ कि तुम दिवाली कैसे मनाओगी? तुम जानती हो ना कि दिवाली का संबंध धर्म से है, राम से है। तो तुम मुझे बताओ कि इस धार्मिक उत्सव को तुम कैसे मनाओगी? मैंने जहां तक देखा है मेरे घर में दिवाली का संबंध सोना-चांदी, घर की सफाई, नये कपड़े और सामान खरीदना, स्वादिष्ट मिठाइयां बनवाना, पटाखे छोड़ना और जब सब मिलने-जुलने वाले आएं तो इसमें दिमाग खपाना कि उनके सामने आने वाली प्लेट में हम ऐसा क्या नयापन भर सकते हैं जिसको खाकर और देखकर वे हमारी तारीफ करने से ना चूकें। अब मुझे बताओ कि इसमें धर्म कहां है? दिवाली तो अधर्म पर धर्म की विजय है, राम के घर आने का उत्सव है, इसमें राम कहां हैं? मैं जा रही हूं असली धर्म के साथ, राम के साथ दिवाली मनाने। और दूसरी बात, तुमने तो पूरा जीवन चूल्हा-चौका और घर-परिवार को ही दिया है ना! क्या तुम घर से खुश हो? पूरा शरीर तुमने खराब कर लिया है, ठीक से चल तक नहीं पाती। घुटनों का ऑपरेशन कराना है मगर निर्णय तक ले नहीं पा रही हो।" वो क्या बोल पाती, बस इतना ही कह पाई, "कि तुम ठीक ही कह रही हो।" इससे ज़्यादा तो मैं उसे क्या बोलती क्योंकि उसकी हालत साफ दिखाई दे रही थी। मैंने उसे अपने गोवा के फोटो भी भेजे थे। उसको आचार्य जी के बारे में भी पता है। उसको गीता सत्रों से जोड़ने की मेरी कोशिश भी नाकाम ही रही थी। कोलकाता में एक ऑफलाइन सत्र भी उसने अटेंड किया था। जो अपना दुश्मन खुद बन बैठा हो उसका कोई क्या कर सकता है? बात सिर्फ चुनाव की है। आचार्य जी आपने नहीं सिखाया होता तो जीवन में दूर-दूर तक ऐसा कुछ भी मैं देख नहीं पाती। अंधे की तरह जीवन जी रही होती और अपने नासमझी से भरे अहंकारिक निर्णयों पर इतरा रही होती। बताना मुश्किल है कि आपने मुझे कैसे अंधकार भरे कुएं में, अपना बचा हुआ जीवन गुजारने से बचाया है। अनंत आभार आचार्य जी 🙏🙏🙏















































